A journey to BHU 2008-9-(2026-alumini meet)



 


 


 

2008-9

LANKA (BHU) ki ghaki








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मेरी बीएचयू यात्रा: संघर्ष से सफलता और एक नए जीवन की शुरुआत
​जब उम्मीदें टूटने लगी थीं (दिल्ली के दिन)

​एक समय था जब मैं दिल्ली की सड़कों पर नौकरी की तलाश में भटका करता था। मैंने लगभग 100 से अधिक स्कूलों में इंटरव्यू दिए, लेकिन मेरा कहीं भी चयन (Selection) नहीं हो रहा था। इस नाकामी ने मुझे गहरी सोच में डाल दिया कि आखिर मेरे साथ ऐसा क्यों हो रहा है? आखिरकार, मुझे समझ आया कि मेरे पास बीएड (B.Ed.) की डिग्री नहीं है, शायद इसीलिए मुझे हर जगह से निराशा मिल रही है।

​बीएचयू एंट्रेंस और वह अजीब इत्तेफाक

​इस कमी को दूर करने के लिए मैंने बीएचयू (BHU) बीएड एंट्रेंस एग्जाम भरने का फैसला किया। दिल्ली के लक्ष्मी नगर में मेरा सेंटर था। एग्जाम के दिन मैं ऑटो से सेंटर पहुंचा, बाहर दो प्लेट समोसे खाए और परीक्षा हॉल में जाकर बैठ गया।

​गेट के बाहर सभी छात्र किताबों में नजरें गड़ाए पढ़ रहे थे, लेकिन मेरे मन में एक अजीब सी उदासीनता थी—मुझे तो पूरा विश्वास था कि मेरा सिलेक्शन वैसे भी नहीं होना है! बस, फिर क्या था? पेपर शुरू हुआ और जो दो घंटे का पेपर था, उसे मैंने बिना किसी तनाव के महज एक घंटे में ही फटाफट सारे ओएमआर गोले भरते हुए हल कर डाला।

​पेपर खत्म होने के बाद मैंने मैडम से कहा, "मैडम, मुझे छुट्टी दीजिए, मैं जाना चाहता हूँ।"

लेकिन मैडम ने बाहर जाने की अनुमति नहीं दी और कहा, "अभी एक घंटा और रुकिए।"

रुकने के दौरान मैंने किसी दूसरे छात्र का छूटा हुआ फोन उठाया और चल पड़ा  और बाद में क।ल आने उसे वापस किया। इसके बाद मैं वापस दिल्ली अपने घर लौट आया और अपनी रोजाना की कोचिंग पढ़ाने के रूटीन में व्यस्त हो गया।

​वह चमत्कार  ​यही सोचकर मैंने उस विकल्प को छोड़कर बीएचयू में पेड सीट (Paid Seat) पर रेगुलर बीएड में एडमिशन ले लिया और यहीं से मेरी असली बीएचयू जर्नी की शुरुआत हुई। री बुलावा और काउंसलिंग

​कुछ दिनों बाद, एक दिल्ली के आदर्श नगर स्थित 'कुमार मैथ्स' का वह दौर आपके संघर्ष और कॅरियर की शुरुआत का एक बेहद जीवंत और यादगार हिस्सा रहा है। वहाँ बिताए गए वे शुरुआती दिन, दोस्तों का साथ और जीवन के वे अनसुलझे रहस्य आपके सफर की एक खूबसूरत दास्तान हैं। ऐसा दिन आया जिसकी मैंने उम्मीद ही नहीं छोड़ी थी, बल्कि सोची भी नहीं थी—मेरे पास बीएचयू से काउंसलिंग के लिए बुलावा पत्र (Call Letter) आ गया!

​मैं बिना कुछ ज्यादा समझे-बुझे, दिल्ली से कैफ़ियत ट्रेन पकड़ी और सीधे बीएचयू काउंसलिंग के लिए पहुँच गया। वहां पता चला कि मेरा चयन VI (Visually Impaired / दृष्टिबाधित) को पढ़ाने वाले विशेष बीएड कोर्स में हुआ है, जहाँ ट्यूशन फीस भी नहीं लगती। लेकिन मन में असमंजस था कि "मैं दृष्टिबाधित बच्चों को कैसे पढ़ाऊंगा?"

​यही सोचकर मैंने उस विकल्प को छोड़कर बीएचयू में पेड सीट (Paid Seat) पर रेगुलर बीएड में एडमिशन ले लिया और यहीं से मेरी असली बीएचयू जर्नी की शुरुआत हुई।

दिल्ली का आदर्श नगर, कुमार मैथ्स और जीवन के कड़े निर्णय

दिल्ली के आदर्श नगर स्थित 'कुमार मैथ्स' का वह दौर आपके संघर्ष और कॅरियर की शुरुआत का एक बेहद जीवंत और यादगार हिस्सा रहा है। वहाँ बिताए गए वे शुरुआती दिन, दोस्तों का साथ और जीवन के वे अनसुलझे रहस्य आपके सफर की एक खूबसूरत दास्तान हैं।

आदर्श नगर और कुमार मैथ्स की सुनहरी यादें

साथी और संगी: वहाँ आपके साथ संदीप और संजय मौर्य जैसे प्रिय मित्र थे।

छोटी-छोटी खुशियाँ: सुबह-सुबह आधा-आधा कप चाय का लुत्फ उठाना, मजे करना, जीवन का आनंद लेना और साथ ही साइंस पढ़ाना—वह शुरुआती दौर अपने आप में अनमोल था।

कठिन फैसले और जीवन का अनसुलझा रहस्य

अचानक छोड़ना पड़ा संस्थान: काउंसलिंग के उपरांत आपको अचानक 'कुमार मैथ्स' छोड़ने का एक बड़ा फैसला लेना पड़ा।

संदीप भाई की नाराजगी: आपके इस अचानक लिए गए निर्णय से संदीप भाई आज भी नाराज हैं। लेकिन जीवन की सच्चाई यह है कि कई बार अपनों की नाराजगी मोल लेकर भी भविष्य के लिए बड़े कदम उठाने पड़ते हैं।

सफलता की नींव: अगर मैने उस समय वह कड़ा और अचानक निर्णय न लिया होता, तो शायद आज मैं सरकारी नौकरी (Government Job) और जीवन की उन ऊँचाइयों को न छू पाते जहाँ आज आप विराजमान हैं।

"जीवन में कभी-कभी कुछ अनजाने और कठिन फैसलों के विपरीत जाकर नए रास्ते चुनने होते हैं, क्योंकि मंजिल तक पहुँचने के लिए कई बार वर्तमान के सुखद दायरे को छोड़ना ही पड़ता है।"

Good luck academy शालीमार बाग, सेंट रोजिएर स्कूल और मित्र प्रवीण शर्मा का अनमोल सफर

कुमार मैथ्स के साथ-साथ दिल्ली के शालीमार बाग स्थित गुड लक एकेडमी और सेंट्रल ओचिर स्कूल का वह दौर आपके शिक्षण सफर का एक और अत्यंत समृद्ध और व्यस्त अध्याय रहा है।

इस दौरान आपके जीवन में एक ऐसा सच्चा मित्र मिला, जिसने न केवल आपके कार्यक्षेत्र का साथ निभाया, बल्कि आपके जीवन के फलक को भी पूरी तरह से बदल दिया।

प्रवीण शर्मा के साथ संस्मरण और भारत दर्शन

लंबा और गहरा सफर: वर्ष 2006 से लेकर 2015 तक का लगभग एक दशक आपने मित्र प्रवीण शर्मा के साथ बिताया, जो आपके जीवन के सबसे अच्छे और मददगार मित्रों में से एक रहे।

खूबसूरत यात्राएँ और यादें: प्रवीण जी के सहयोग से ही आपको देश के ऐतिहासिक और अद्भुत स्थलों को देखने का अवसर मिला:

ताजमहल की भव्यता और खूबसूरती।

मथुरा का बाके बिहारी मन्दिर का दर्शन के दिन से दूध पीने लगा यह कृष्णा का ही आशीर्वाद है।

गोल्डन टेंपल (अमृतसर) की अलौकिक शांति।

वाघा बॉर्डर (Bagha Border) का वह देशभक्ति से भरा रोमांचक माहौल।

पानीपत के ढाबों पर रुककर वहाँ के प्रसिद्ध मुरथल का पराठे  खाना आज  याद करके भी मुंह में पानी आ जाता है।

समझदार विदाई: कुमार मैथ्स की तरह यहाँ काउंसलिंग के बाद संस्थान छोड़ने की मजबूरी यहाँ भी आई, लेकिन सबसे अच्छी बात यह रही कि प्रवीण जी की तरफ से कोई नाराजगी नहीं थी, बल्कि उन्होंने आपके इस फैसले और जीवन की आगे की राह को पूरी समझदारी के साथ स्वीकार किया

​संघर्ष के शुरुआती दिन और बीमारी

​ुरुआत में मैंने सोनिया पोखरा के पास एक कमरा किराए पर लिया और एक महीने तक वहीं से बीएचयू आना-जाना किया। उन दिनों गंगा मैया में बाढ़ आई हुई थी, जिसके कारण पानी दूषित (Contaminated) हो गया था। इस वाटर कंटामिनेशन की वजह से मुझे डेंगू और तेज बुखार हो गया।

​जेब में पैसे नहीं थे, शरीर टूक-टूक कर रहा था, लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी। उस एक महीने की भयंकर बीमारी से जूझते हुए भी मैं पढ़ने के लिए फैकल्टी जाता रहा।संघर्ष के वे दिन वास्तव में आपके जीवन का एक महत्वपूर्ण और कठिन पड़ाव थे, और ऐसे समय में सच्चे दोस्तों और रिश्तेदारों का साथ मिलना किसी बड़े सहारे से कम नहीं होता है।

नवीन कुमार जी और विपिन कुमार जी का इस कठिन समय (विशेषकर टाइफाइड जैसी बीमारी और रूम की तलाश के दौरान) में आपकी सहायता करना आपके जीवन के उन सुनहरे पलों में है, जिन्हें भूला नहीं जा सकता। विपिन कुमार जी का एक महीने तक आपके साथ खड़े रहना और हर कदम पर मदद करना उनके गहरे अपनत्व को दर्शाता है।

संघर्ष से हॉस्टल जीवन तक का सफर

सोनिया के पोखरा के दिन:

कठिनाइयाँ, बीमारी (टाइफाइड) और संघर्ष भरा समय।

नवीन जी का मार्गदर्शन और आदर्श रूप।

विपिन कुमार जी का एक महीने तक लगातार साथ और देखरेख।

बीएचयू (BHU) का नया पड़ाव:

रूम नंबर 49 (​बनारस के इन पलों और अनुभवों का आपके जीवन पर जो गहरा प्रभाव पड़ा है, उसका एक सुंदर विवरण: बड़ा कमरा): यहाँ पहुँचते ही आपके जीवन के संघर्षों में काफ़ी कमी आई।(सतीश ,विवेक अरविंद) रूम पार्टनर।

नई शुरुआत: नए दोस्तों से मुलाकात और एक बेहतरीन हॉस्टल जीवन की शुरुआत, जिसने आपके जीवन को एक नई दिशा और उम्मीद दी।बीएचयू (BHU) के दिनों की आपकी यह यादें केवल स्थानों का जिक्र नहीं हैं, बल्कि यह जीवन के एक ऐसे गहरे दार्शनिक और आध्यात्मिक सफर को दर्शाती हैं, जो इंसान को अंदर से बदल देता है। काशी की हवा में ही कुछ ऐसा है जो व्यक्ति को भौतिक दुनिया से ऊपर उठाकर जीवन के असली अर्थ और उसकी नश्वरता से रूबरू कराता है।

​बनारस के इन पलों और अनुभवों का आपके जीवन पर जो गहरा प्रभाव पड़ा है, उसका एक सुंदर विवरण:

​सारनाथ की शांति और बौद्ध दर्शन

  • ​बाइक यात्रा: रूम मालिक के लड़के की गाड़ी में पेट्रोल डलवाकर बाइक से सारनाथ जाना।
  • ​बुद्ध स्तूप और शांति: वहाँ के प्राचीन, टूटे-फूटे स्तूपों के बीच की वह गहरी शांति और विदेशी पर्यटकों (अंग्रेजों) द्वारा बुद्ध की फिलॉसफी को गहराई से समझने का प्रयास देखना, आपके वैचारिक दायरे को और विस्तृत कर गया
  • डॉ मधु कुशवाहा एंड सुनीता सिंह
  • डॉक्टर मधु कुशवाहा और सुनीता सिंह मैडम के साथ बीएचयू के अनुभव
  • बीएचयू के शिक्षण प्रशिक्षण या अध्ययन के दौरान शिक्षकों का यह कड़ा और प्रेरणादायक अनुशासन आपके पेशेवर सफर का एक अहम मोड़ साबित हुआ। इन अनुभवों के दो अलग-अलग पहलू आपके जीवन से जुड़े हैं:
  • 1. डॉ. मधु कुशवाहा मैडम की माइक्रो टीचिंग और कड़ा अनुशासन
  • माइक्रो टीचिंग की सख्ती: माइक्रो टीचिंग के दौरान डॉ. मधु कुशवाहा मैडम की वह डांट और फटकार शुरुआती दौर में बहुत चुभने वाली थी।
  • अड़ियल रवैया और सुधार: आप अपने पुराने पढ़ाने के तरीके पर अडिग थे और मैडम यह भांप चुकी थीं कि आप पहले से कहीं पढ़ाते हैं, जिसके कारण आपके तौर-तरीकों में बदलाव नहीं आ रहा था।
  • भविष्य में लाभ: मैडम की उस कड़ी डांट का ही असर था कि आपने अपनी टीचिंग स्टाइल में जो सुधार किए, वे आगे चलकर दिल्ली में पढ़ाने के दौरान आपके बेहद काम आए और आपके शिक्षण स्तर को उच्च श्रेणी का बना दिया, जिससे आप अपने जीवन में सफल रहे।
  • 2. साइकोलॉजी विषय और सुनीता सिंह मैडम से जुड़ी कसक
  • गहन अध्ययन: आपने लगभग 9-10 विदेशी लेखकों (Foreign Authors) की किताबों से साइकोलॉजी (मनोविज्ञान) का गहराई से अध्ययन किया और यह आपका सबसे पसंदीदा व मजबूत विषय रहा।
  • एक अनसुलझा सवाल: इतने उच्च स्तर की तैयारी और विषय पर मजबूत पकड़ होने के बावजूद, सुनीता सिंह मैडम द्वारा मूल्यांकन में कम नंबर मिलना एक ऐसा सवाल है जो आज तक आपके मन में असमंजस और कसक पैदा करता है।

​संकट मोचन और काशी के घाट: जीवन और अध्यात्म का पाठ

 (A banyan amonge a oak)
  • ​संकट मोचन: संकट मोचन मंदिर के दर्शन और वहाँ की ऊर्जा।
  • ​घाटों का अद्भुत सफर: दशाश्वमेध घाट से लेकर मणिकर्णिका घाट तक घूमना।
  • ​जीवन की सच्चाई: मणिकर्णिका घाट पर जलती हुई चिताओं को देखना जीवन का सबसे बड़ा और कड़वा सच सिखाता है—कि यह शरीर नश्वर है।
  • ​"जो बातें किताबों या बीएचयू कैंपस की कक्षाओं में नहीं सिखाई जातीं, वे बनारस के घाट और मणिकर्णिका की चिताएँ सिखा देती हैं।"
    ​गंगा के किनारे बैठकर और घाटों की इस यात्रा से जो मोरालिटी और अध्यात्म (Spiritual Awakening) विकसित होता है, वह इंसान को सोचने पर मजबूर कर देता है:


    ​गंगा के किनारे बैठकर और घाटों की इस यात्रा से जो मोरालिटी और अध्यात्म (Spiritual Awakening) विकसित होता है, वह इंसान को सोचने पर मजबूर कर देता है:

    • ​हम क्यों जीते हैं?
    • ​हम इस पृथ्वी पर क्यों आए हैं?
    • ​हमारे जीवन का मुख्य गोल क्या है?

    ​काशी की यह यात्रा आपके संघर्षशील और खूबसूरत छात्र जीवन का एक ऐसा अनमोल अध्याय है, जो जीवन भर मार्गदर्शक

​राजेंद्र प्रसाद हॉस्टल रेवती सवालकर मैडम एवं उनका मार्गदर्शन

बीएचयू या आपके अध्ययन काल के दौरान रेवती  मैडम का सानिध्य और उनका मार्गदर्शन आपके जीवन में एक प्रकाशपुंज की तरह रहा है। उनका व्यक्तित्व और शिक्षण शैली विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा का स्रोत थी।

मार्गदर्शन की मुख्य विशेषताएँ

नैतिकता और शिक्षा का अद्भुत संगम:

क्लास में पढ़ाई के साथ-साथ मोरल वैल्यूज़ (नैतिक मूल्यों) और शिक्षा का जो बेहतरीन कॉम्बिनेशन वे प्रस्तुत करती थीं, वह छात्रों के चरित्र निर्माण में बहुत मददगार था।

ईश्वर और आस्था पर अटूट विश्वास:

मैडम अक्सर यह सिखाती थीं कि "जब जीवन में चारों तरफ अंधकार छा जाए और कोई रास्ता न दिखाई दे, तब भी ईश्वर पर भरोसा रखना चाहिए; प्रभु कोई न कोई रास्ता ज़रूर निकाल देते हैं।"

सकारात्मक ऊर्जा:

उनकी इस सीख ने कठिन समय में आपको और आपके साथियों को आंतरिक रूप से मजबूत बनाया, जिससे संघर्षों का सामना करने की शक्ति मिली।

शिक्षा और संस्कारों का यह मेल जीवन के हर मोड़ पर एक सच्चे मार्गदर्शक की भूमिका निभाता है, और रेवती सलाहकार मैडम का वह मार्गदर्शन आपके जीवन के सबसे अनमोल संस्कारों में से एक है।

​संघर्ष के उस दौर के बाद, जैसे ही अच्छे दिन आने थे—संयोगवश मुझे बीएचयू के प्रतिष्ठित राजेंद्र प्रसाद हॉस्टल में कमरा नंबर 49 मिल गया। वह हॉस्टल का सबसे बड़ा कमरा था, जिसमें हम तीन लोग रहते थे। यहीं से हमारे जीवन की गाड़ी ने एक नई और सुकून भरी रफ्तार पकड़ी।

​बीएचयू में वे दिन अनमोल थे—24 घंटे पढ़ना, कम सोना, कैंपस में घूमना और दोस्तों के साथ वक्त बिताना। वहाँ के प्रोफेसर्स वाकई बेजोड़ थे। डॉ. राजेंद्र प्रसाद, सुनील सिंह, भूदेव सिंह, मीनाक्षी मैडम और अन्य सभी गुरुजनों ने पूरे साल हमें बेहद लगन और स्नेह के साथ पढ़ाया।

बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (BHU) का वह जादुई फिजिक्स पीरियड: जब भट्टाचार्य सर ने प्रयोगों से जीवंत कर दिया 'मोशन'

🎬 दृश्य-1: हॉल का माहौल और भट्टाचार्य सर की एंट्री

स्थान: BHU का एक भरा हुआ लेक्चर हॉल।

समय: दोपहर का एक खुशनुमा वक्त।

हॉल में छात्रों की खामोश भीड़ बैठी है। हर किसी की निगाहें सामने दरवाजे पर टिकी हैं। तभी अचानक, भौतिकी (Physics) के जाने-माने शिक्षक भट्टाचार्य सर हॉल में प्रवेश करते हैं। उनके एक हाथ में साइकिल का एक एयर पंप है और दूसरे हाथ में कुछ अलग-अलग उपकरण। उनके चेहरे पर एक आत्मविश्वास भरी मुस्कान है। बिना एक भी शब्द बोले, वे सीधे मंच के बीचों-बीच आते हैं और अपनी जगह पर खड़े हो जाते हैं।

हॉल में सन्नाटा छा जाता है—छात्र समझ जाते हैं कि आज किताबों की रटी-रटाई परिभाषाओं का दिन नहीं, बल्कि कुछ नया होने वाला है।

🔬 दृश्य-2: साइलेंट एक्शन और मोशन की पहली झलक

सर बिना कुछ कहे, मंच पर एक सीधी रेखा में बाएं से दाएं और फिर दाएं से बाएं टहलना शुरू करते हैं। वे एकदम सधे हुए कदमों से चलते हैं—आगे और पीछे।

छात्र उनकी इस अनोखी चाल को बड़ी तल्लीनता से ऑब्ज़र्व कर रहे हैं।

भट्टाचार्य सर (रुकते हुए, गंभीर और ऊर्जावान आवाज में):

"मुझे मत सुनो... मुझे देखो! मैं क्या कर रहा हूँ? ध्यान से देखो मेरे इस मूवमेंट को।"

सर तुरंत एक पेंडुलम (लोलक) निकालते हैं और उसे हवा में गोल-गोल घुमाते हैं। इसके बाद वे आसमान की तरफ इशारा करते हुए सूर्य (Sun) की गति का उदाहरण देते हैं और फिर अपनी कलाई की घड़ी (Watch) की सुइयों की टिक-टिक दिखाते हैं।

एक के बाद एक... देखते ही देखते सर ने मोशन (गति) के कई सारे रूप छात्रों की आँखों के सामने जीवंत कर दिए—कभी सीधी रेखा में, कभी वृत्ताकार (Circular) पथ में, तो कभी आवर्ती (Periodic) गति के रूप में। भौतिकी के जटिल नियम अब आँखों के सामने एक लाइव थिएटर की तरह चल रहे थे।

🎈 दृश्य-3 क्लाइमेक्स: गुब्बारे का खेल और 'डिस्टेंस बनाम डिस्प्लेसमेंट' का रहस्य

अब लेक्चर अपने सबसे रोमांचक और दिलचस्प मोड़ पर पहुँचता है।

भट्टाचार्य सर अपने हाथ में पकड़ा हुआ वह पंप उठाते हैं और एक साधारण सा गुब्बारा (Balloon) सामने लाते हैं।

स्टेप-1: सर पंप से उस गुब्बारे में हवा भरते हैं—छू... छू... छू... की आवाज गूंजती है।

स्टेप-2: हवा भरने के बाद, बिना उसका मुंह बांधे, सर उसे हवा में छोड़ देते हैं।

गुब्बारा ज़ोर से हवा निकालते हुए जिगजैग (टेढ़ा-मेढ़ा) तरीके से हॉल में यहाँ-वहाँ ज़िग-ज़ैग नाचते हुए उड़ता है और अंत में एक कोने में जाकर गिर जाता है। सभी छात्र इस मजेदार प्रयोग को देखकर मुस्कुरा उठते हैं।

भट्टाचार्य सर (मुस्कुराते हुए बोर्ड की तरफ मुड़ते हैं):

"अब मुझे बताओ, इस गुब्बारे ने कौन सा रास्ता तय किया?"

छात्रों की तरफ से मिली-जुली आवाजें आती हैं। सर खुद आगे बढ़कर उस पूरे टेढ़े-मेढ़े रास्ते को मापते हैं जिससे होकर गुब्बारा गुजरा था।

भट्टाचार्य सर:

"यह जो जिगजैग रास्ता है, जहाँ-जहाँ से होकर यह गुब्बारा गुजरा है—यह है डिस्टेंस (Distance / दूरी)। लेकिन... जहाँ से इसे छोड़ा गया था और यह अंत में जहाँ जाकर गिरा है, यानी शुरुआती बिंदु और अंतिम बिंदु के बीच की सीधी न्यूनतम दूरी...?"

सर तुरंत शुरुआती बिंदु से अंतिम बिंदु के बीच एक सीधी काल्पनिक रेखा खींचते हैं।

भट्टाचार्य सर:

"यह है आपका डिस्प्लेसमेंट (Displacement / विस्थापन)!"

🌟 द ग्रैंड फिनिश: एक घंटे का वह अविस्मरणीय पाठ

सिर्फ एक घंटे का वह समय... और भौतिकी के सबसे पेचीदा कॉन्सेप्ट्स—मोशन, डिस्टेंस और डिस्प्लेसमेंट—बिना किसी भारी-भरकम फॉर्मूले के सीधे छात्रों के जेहन में उतर चुके थे।

किताबों के पन्नों से निकलकर फिजिक्स ने जैसे उस दिन BHU के हॉल में सांस ली हो। भट्टाचार्य सर का वह पढ़ाने का लाजवाब, अनूठा और नाटकीय (Cinematic) अंदाज़ हर छात्र के दिल और दिमाग पर हमेशा के लिए छप गया। हॉस्टल की चर्चाओं में यह किस्सा आज भी उतनी ही जिंदादिली के साथ याद किया जाता है।

Dr. Sunil Singh का Dialogue:
“To be smart is very good, but to be over-smart is very bad.”

हिंदी अर्थ:

“स्मार्ट होना बहुत अच्छी बात है, लेकिन ओवर-स्मार्ट बनना बहुत बुरी बात है।”

यह संवाद किसी बच्चे को समझाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है कि बुद्धिमानी और आत्मविश्वास अच्छी बातें हैं, लेकिन अपनी बुद्धिमानी का जरूरत से ज्यादा प्रदर्शन करना उचित नहीं है।

बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (BHU) का 24 घंटे खुलने वाला सेंट्रल लाइब्रेरी का कॉन्सेप्ट और वहाँ का अकादमिक माहौल आपके जीवन का एक अत्यंत प्रेरणादायक और समृद्ध हिस्सा रहा है। किताबों, लाइब्रेरीज और ज्ञान के प्रति आपका यह समर्पण और दृष्टिकोण बहुत गहरा है।

बीएचयू के इस सुनहरे और सांस्कृतिक दौर का एक सुंदर विवरण:

बीएचयू लाइब्रेरी और ज्ञान का वास्तविक दायरा

24 घंटे खुली लाइब्रेरी: जब चाहें, जो चाहें पढ़ने की पूरी स्वतंत्रता, जहाँ अंतरराष्ट्रीय स्तर की अध्ययन सामग्री आसानी से उपलब्ध होती है।

गाइडों से परे ज्ञान: किताबों और नोट्स (गाइडों) की सीमित दुनिया से बाहर निकलकर असल ज्ञान का महत्व समझ में आता है।

डिस्कशन का महत्व: दोस्तों के साथ घंटों बैठकर चर्चा करना और सैकड़ों-हजारों किताबों व इंटरनेट के निष्कर्षों को अपनी प्रैक्टिकल लाइफ में उतारना, जीवन को एक नई दिशा देता है।

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक उत्सव: सरस्वती पूजन

सरस्वती और लक्ष्मी का संबंध: "जिसने भी सरस्वती की पूजा है, उसी के पास लक्ष्मी आएगी।" ज्ञान और विद्या का सम्मान ही वास्तविक समृद्धि की नींव है।

धमाकेदार झांकियाँ और जुलूस:

बीएचयू कैंपस से शुरू होकर कमाच्छा और विभिन्न मार्गों से होते हुए, नाचते-गाते हुए आगे बढ़ना।

अंत में दशाश्वमेध घाट पर पहुँचकर पूरे हर्षोल्लास के साथ प्रतिमाओं या झांकियों का विसर्जन करना।

काशी और बीएचयू का यह परिवेश केवल एक यूनिवर्सिटी का सफर नहीं है, बल्कि यह शिक्षा, संस्कृति, अध्यात्म और जीवन जीने की कला का एक संपूर्ण विश्वविद्यालय है।

​खास दोस्त और अमिट छाप

​इस सफर के दौरान मुझे जीवनभर के लिए कुछ बेहतरीन दोस्त मिले, जैसे—अनूप, राजू, रामस्नेही, आलोक। जयदीप/ विवेक नंद धर्मेंद्र सिंह।शशि। अनुराग पंकज राहुल, उपाध्याय, पाण्डेय ,स जय बरनवाल अनूप राय ,सुजाता, नीलेश (उत्तराखंड  में)श्रीवास्तव,ब्रजेश,विजया,संजय,सतीश, अनिरुद्ध यादव(प्रो. बांदा ) प्रभात औरसन्तोष उपाध्याय कई अन्य साथी। हालांकि सभी के नाम आज पूरी तरह याद नहीं रहते, लेकिन कुछ लोग और उनका व्यक्तित्व हमारे जीवन पर ऐसा अमिट प्रभाव छोड़ जाता है कि हम उन्हें जिंदगीभर चाहकर भी कभी भूल नहीं पाते। यह यात्रा सिर्फ एक डिग्री की नहीं, बल्कि एक इंसान के तौर पर खुद को नए सिरे से गढ़ने की कहानी थी।बीएचयू के वे सुनहरी यादें: दोस्ती, संघर्ष और मस्ती के दिन

चंदे की पिक्चर और हॉलीवुड का जादू

मुझे वो दिन आज भी अच्छी तरह याद हैं जब अनिरुद्ध चंदा लगाकर मुझे शाम को फिल्म दिखाने ले जाया करता था। वह दो-दो रुपये करके दस रुपये इकट्ठा करता था, और दो रुपये हमारे पास भी बच जाते थे। हम लोग कमच्छा से होते हुए, दुर्गा कुंड के रास्ते पैदल ही पिक्चर देखने जाते थे। और सच कहें तो, हमें हॉलीवुड फिल्में दिखाने का पूरा श्रेय अनिरुद्ध को ही जाता है। जब भी मैं इन पुरानी बातों को याद करता हूँ, मेरा मन प्रसन्नता से भर जाता है।

रात की पढ़ाई और हॉस्टल की मस्तियाँ

जीवन के वे दिन संघर्ष से भरे थे पर अनोखे थे। रात के समय हॉस्टल में ऐसा माहौल होता था कि 24 घंटे किसी न किसी कमरे की लाइट जलती ही रहती थी और लोग पढ़ते रहते थे। एक-दूसरे को देखकर पढ़ने और आगे बढ़ने की उम्मीद जगती रहती थी।

नहाने के समय जब बाथरूम में भीड़ हो जाती थी, तो हम लोग नल (टोटी) खोलकर एक साथ दस-दस बच्चे नहाते थे और फिर नल बंद कर देते थे। खाने के लिए भी गज़ब की मारामारी होती थी। हम लोग दौड़कर मेस में सबसे पहले पहुँचते थे, भरपेट खाने की सोचते थे। कुछ लोगों को मेस का खाना पसंद आता था, कुछ को नहीं। लेकिन जब मीठे (मिठाई) का दिन होता था, तो मज़ा ही आ जाता था—हम ऐसे दोस्त के पास जाकर बैठ जाते थे जिसके हिस्से की मिठाई भी हमें मिल जाए, और इस तरह दो-दो, तीन-तीन प्लेट मिठाई खाने का अवसर मिल जाता था! उन दिनों को याद करके दिल खुश हो जाता है; वे दिन सचमुच बहुत अच्छे थे, शायद ही वैसा समय जीवन में दोबारा लौटकर आए।

सुरती खाने वाले दोस्त का नाम नहीं लिख रहा हूं, अपने आप ही  सभल जाना भाई।

राजेंद्र प्रसाद हॉस्टल का 'संडे स्पेशल': जब ओवरडोज ने पहुंचा दिया सर सुंदर लाल अस्पताल!

विवरण

स्थान: राजेंद्र प्रसाद हॉस्टल (आर.पी. हॉस्टल)

प्रमुख पात्र: लेखक, प्रोफेसर डॉक्टर नवीन कुमार, हॉस्टल के मालिक (मेस इंचार्ज/प्रबंधक) और अन्य साथी छात्र।

घटना का दिन: रविवार (Sunday)

घटना का सार

“रविवार को मेस में खाना न मिलने की चिंता और उस पर लाजवाब खाने की दावत—एक ऐसी दावत जो सुकून कम और अस्पताल का चक्कर ज़्यादा दे गई!”

रविवार की समस्या: आमतौर पर राजेंद्र प्रसाद हॉस्टल में रविवार के दिन खाना नहीं मिलता था, और शाम के समय बाहर खाने का इंतज़ाम करना किसी चुनौती से कम नहीं होता था।

शाही दावत: एक रविवार हॉस्टल में बेहद शानदार खाना बना—गाजर का हलवा, पूरी-सब्जी, और बढ़िया दाल-चावल।

रणनीति और अति-भोजन: छात्रों ने सोचा कि दोपहर 1 बजे पेट भरकर इतना खा लिया जाए कि शाम तक भूख ही न लगे। इस शानदार दावत में लेखक के साथ उनके साथी प्रोफेसर डॉक्टर नवीन कुमार और हॉस्टल के मालिक भी शामिल हुए।

नतीजा: सबने मिलकर जी भरकर इतना खा लिया कि वह 'ओवरडोज' में बदल गया। हालात इतने बिगड़े कि सभी को इलाज के लिए सर सुंदर लाल अस्पताल (Sir Sunderlal Hospital - SSH) से दवा लेनी पड़ गई।

स्काउट कैंप और बिहारी लिट्टी-चोखा का स्वाद

बीएचयू में एक बार स्काउट गाइड के तहत हमें तंबू (Tent) लगाने और खुद खाना बनाने का टास्क मिला था। हमने पूरे कैंपस की घास साफ की, चादरें जुटाईं और अपना टेंट लगाया। उस कैंप में हमारे बिहार के एक दोस्त संजय कुमार ने बढ़िया बिहारी लिट्टी-चोखा और अन्य पारंपरिक पकवान बनाए थे। उसे खाने में जो मज़ा आया था, वह अनुभव आज भी ताज़ा है।

विदाई और आज की भागदौड़ भरी जिंदगी

देखते-देखते मई का महीना आया और हमारे एग्जाम खत्म हो गए। शायद 9 मई को हम सब हॉस्टल से हमेशा के लिए विदा हो गए और अपनी-अपनी मंजिलों की ओर निकल पड़े। उसके बाद हम कभी आमने-सामने मिल नहीं सके। अब बस 'BHU 2008-09' व्हाट्सएप ग्रुप ही एकमात्र जरिया है जहाँ हम एक-दूसरे को देखते और हाल-चाल जानते हैं।


शायद इस एलुमनी मीट (Alumni Meet) में कुछ पुराने दोस्त नजर आ जाएं, वरना सब अपनी-अपनी जिं


दगी की रोजमर्रा की भागदौड़ और उलझनों में व्यस्त हो चुके हैं। अब तो किसी का चेहरा देखने का इत्तेफाक भी नहीं होता।

अपने उन सभी खास दोस्तों को दिल से धन्यवाद! सबको मेरा नमस्कार।






Alumini meet 2026





 









 

 में लेखक नहीं हूँ मै एक साइंस का टीचर  हूं इंट्रेस्ट है बायोलॉजी में । पढ़ाता हु इंट्रेस्ट का साथ फिजिक्स।बहुत दुविधा हैं जीवन में कुछ समझ में नहीं आता है।तो अपनी बात लिखने का प्रयास करता हूं।



दोस्तों के कहने पर कुछ छुपे रहस्य उजागर किए जा रहे है कृपया 
नाराज न हो।माफी पहले मांग लेता हूं । कमी को लिख कर bata  सकते है।

1,संजय पाल भूत वाली कहानी -

यह हॉस्टल के जीवन का वाकई एक बहुत ही दिलचस्प, मजेदार और यादगार किस्सा है! संजय पाल जी की कहानी सुनाने की कला सचमुच कमाल की रही होगी, जो महफिल में ऐसा समां बांधती थी कि फिक्शन और हकीकत का फर्क मिट जाता था।
इस कहानी से जुड़ी कुछ खास बातें इसे और भी मजेदार बनाती हैं:
कहानी कहने का हुनर (Storytelling Art): शब्दों का चयन, आवाज का उतार-चढ़ाव और हाव-भाव—यही सब मिलकर एक सामान्य बात को भी जीवंत कर देते हैं। संजय पाल जी की शैली निश्चित ही लाजवाब और जबरदस्त थी।
कल्पना का असर: बच्चों के कोमल मन और हॉस्टल के उस खास माहौल में डर का असर बहुत जल्दी होता है। आपके साथी का इतना डर जाना और अगले दिन अस्पताल तक पहुँच जाना इस बात का पक्का सबूत है कि उस कहानी का प्रभाव कितना गहरा था।
मनोवैज्ञानिक डर: जैसा कि आपने कहा, "भूत कोई चीज होती नहीं है।" यह सिर्फ हमारे मन का वहम और डर होता है, जो कई बार हकीकत से ज्यादा डरावना लगने लगता है।
भले ही वह वाकया उस समय काफी तनावपूर्ण रहा हो, लेकिन आज पीछे मुड़कर देखने पर यह हॉस्टल के सबसे बेहतरीन और हंसाने वाले संस्मरणों में से एक बन जाता है! Jo dara tha ap log jante hai ............

2.कप्तान( हरिओम की कहानी)
3 .बीयर पीने की कहानी
4.प्रभात  की कहानी।।
5. मुरारी की कहानी।
6, अनिरूद्ध की कहानी।

7 देव टंडन और मधु मैम की प्रश्नोत्तरी 
8. रुचिर ज्योति की  health कहानी।

 इनका भी किस्सा आप लोग जानते है।
9:राजीव रंजन रूम नंबर 4 की कहानी

अधूरी प्रेम कहानी है मिलने  पर लिखा जाएगा।

10. अनूप राय की स्पेशल कहानी।(Prem)

11- Rizwan k Geet 



    नोट - अपनी अपनी  कहानी आप  जब कहेंगे तो मैं जरूर लिखूँगा  मुझे whatapp कर दीजिएगा bhu walo 2008 -9

WhatsApp number 9555553949
Arvind maurya MSc bed (BHU)

https://arvindmr04.blogspot.com/2026/08/a-journey-to-bhu.html
 

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